Tuesday, December 11, 2007
टिकना जरूरी है। जनता हूँ। लेकिन मन का क्या। मैं जनता हूँ। मन तो नही जनता। कम्बख्त मन। साला जब देखो कुछ न कुछ गड़बड़ करता है। खास कर तब जब जरूरत कुछ और हो। अपनी पींगे पेलने से बाज नही आयेगा। अब देखिएना अभी सब कुछ ठीक तो चल रह है। लेकिन अब यह ना लगने का बहाना dhundh लाया है। न जाने कहाँ से। रोज समझाता हूँ। जिद्दी इतना कि मानने को तैयार ही नही। अब इसकी मानू तो सड़क पर आ जाऊँ। तब साला वहाँ भी नखरा पेलेगा।
लेकिन मन भी क्या करे। जहाँ पैदा हुआ, पाला पोसा गया वह जमीं ही कुछ ऐसी थी। मनचला हो गया। अब संभाले नही संभल रहा। अब भाई गलती कि है तो भुगतना तो पड़ेगा ही। देखते हैं। ......
लेकिन मन भी क्या करे। जहाँ पैदा हुआ, पाला पोसा गया वह जमीं ही कुछ ऐसी थी। मनचला हो गया। अब संभाले नही संभल रहा। अब भाई गलती कि है तो भुगतना तो पड़ेगा ही। देखते हैं। ......
Friday, December 7, 2007
सबक मुश्किल है
रोज कुछ नया जोड़ने कि कोशिश, लेकिन रफ्तार बेहद धीमी है। इसलिए कुछ मजा नहीं आ रहा। आज फोटो लोड करने कि कोशिश करता रहा लेकिन हुआ नहीं। कहीं और ही चला गया। लगत है अब किसी से पूचना ही पड़ेगा। अब कल।
Tuesday, December 4, 2007
अचंभित हूँ
कितना लिख रहे हैं लोग। अपन तो सोचते ही रह जाते हैं। आखिर सोचना कभी तो बंद होगा। फिर देखना। लिख मरूँगा। एक बड़ी मुसीबत लेखन रफ्तार का कम होना भी है। खैर समय के साथ अंगुलियाँ कुछ तो शर्म करेंगी। भाई अभी तो रामराम।
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