टिकना जरूरी है। जनता हूँ। लेकिन मन का क्या। मैं जनता हूँ। मन तो नही जनता। कम्बख्त मन। साला जब देखो कुछ न कुछ गड़बड़ करता है। खास कर तब जब जरूरत कुछ और हो। अपनी पींगे पेलने से बाज नही आयेगा। अब देखिएना अभी सब कुछ ठीक तो चल रह है। लेकिन अब यह ना लगने का बहाना dhundh लाया है। न जाने कहाँ से। रोज समझाता हूँ। जिद्दी इतना कि मानने को तैयार ही नही। अब इसकी मानू तो सड़क पर आ जाऊँ। तब साला वहाँ भी नखरा पेलेगा।
लेकिन मन भी क्या करे। जहाँ पैदा हुआ, पाला पोसा गया वह जमीं ही कुछ ऐसी थी। मनचला हो गया। अब संभाले नही संभल रहा। अब भाई गलती कि है तो भुगतना तो पड़ेगा ही। देखते हैं। ......
Tuesday, December 11, 2007
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