Thursday, January 10, 2008

बकरचोदी बरास्ते पत्रकारिता

कई बार मुझे लगता है कि बकरचोदी की इंतहा हो गयी। बोलने वाले तो बोलने वाले लिख कर बाल बच्चे का पेट भरने वाले भी गार फार कर भूसा भरने को तैयार हैं। मजे कि बात तो यह है कि जब अपनी गार फटती है तब भी कहते पाए जाते हैं कि क्या मजे कि बात है। भारी बकलंड हैं ऐसे लोग। लेकिन हैं तो हैं। अब मैं ही क्या कम हूँ। नमूना पेश किये जा रह हूँ। एक के बाद एक। अजी अब जिसका भी नाम लूँगा उसी कि गार में आग लग जायेगी। तो मैं ही क्यों अच्छा बनू।

Wednesday, January 9, 2008

कुछ कहना है

लोकतंत्र जरुरी है तो लोकतांत्रिक होना भी उतना ही जरूरी है। जो में नही हूँ। या उस हद तक नही हूँ जितने की जरूरत है। अभी तीन दिन हुए हैं जब में उस टीम का हिस्सा बना जिसे पत्रिका में पुरस्कृत किया गया। कप्तान थे अरुण चौहान। दरअसल यह खालिश उनकी जीत थी। लेकिन जब लेने की बरी आई तो उन्होने सब को हिस्सा बनाया जो टीम में शामिल थे। जबकि देने के वकत वो अकेले थे। और ये सब सिर्फ अख़बार की बेहतरी के लिए। ताकि लोग काम में शामिल हो सकें। है ना सर...... बिलकुल है। ये में कह रहा हूँ। लेकिन कैप्टन इतना ध्यान रखना, यह karj है जो मैं kabhi ना कभी जरूर उतारुंगा। kab पता नही। फ़िलहाल आपके इतना लोकतंत्र यदि मेरे भीतर आ जाये त कितना मजा आये। लाला सलाम captain। आपके sath काम करना मेरी जिन्दगी का हासिल रहेगा।

Saturday, January 5, 2008

ढीठ कहीं के

अभी बस अभी मेरे एक दोस्त, कह सकते हैं, का समस आया। नए साल कि शुभकामना और थोडी शिक़ायत भी। हद दर्जे कि नाटकियेता है। कहाँ से सीखा अपने ये सब। फिक्र इसका नही कि खुद जान लिया मुसीबत ये कि दूसरो को भी सिखा रहे हैं। लेकिन एक नसीहत, सामने वाले को मूर्ख समझने में बुराई नही है लेकिन पूरे तौर पर चूतिया ही समझना कहाँ तक मुनासिब है। आप ही बताईये।

बहाना बहाना सिर्फ बहाना

रोज की तरह आज भी घर पर बात कर रह था। तभी माँ बोली फिरन चाची नहीं रहीं। गोवा में उनका निधन हो गया। करीब दस दिन हुए। गांव जाने पर कौन भूजा लेकर आयेगा। और दिवार के किनारे से च च कि आवाज देकर आँगन में बुलाएगा। फिर बैठा कर खूब सारी बातें करेगा। अपने बारे में, गांव के बारे में, सबके बारे में। गांव पहुँचते ही हमारा पहला ठिकाना होता था फिरन चाचा का घर। बाबू जी के पुराने दोस्त जो थे। सबसे अधिक फिक्र चाची को ही लगी रहती थी। खाया कि नहीं। नहाया कि नही। चाय पीने क्यों नही आया। न जाने कितने सवाल। अब सारे सवाल ख़त्म। भोपाल जाने के बाद से एक बार भी गांव नही गया। हर बार कोई नया बहाना। इस बार समय कम है तो अबकी काम अधिक। मिल ही नहीं पाया। लेकिन अब कब मिलना होगा। कोई बताएगा कि आखिर हम मिलना क्यों चाहते हैं। किसी से भी। क्या मिलता है। बता दो यार।

Friday, January 4, 2008

सार्थक निरर्थक का न्यास

कैसे साबित हो कि क्या सार्थक है और क्या निरर्थक। कौन करे यह तय। और करने का आधार क्या हो जिसे सब माने। या कम से कम अधिकांश उसे खा पी चबा सके। एक कि लिए जो सार्थक है वही किसी और के लिए निरर्थक हो सकता है। होने कि पूरी गुन्जायिश है। सिर्फ इसलिए क्यूंकि उसमे सार्थकता जो जुडा हुआ है। अछ एक बड़ा सवाल समय का भी है। किसी खास समय जो सार्थक हो सकता है वही समय बीतने पर निरर्थक। अब ऐसे में आदमी करे तो क्या। बड़ा विकट है। फिर तो जो मर्जी आये वही करना सही है। इस बार नए साल पर मैंने किसी को शुभकामना देने का काम नही किया। खुद आगे बढ़ कर। मजदूरी भरा कम लगता है। यदि कहीं से आया तो जबाब भर देकर इतिश्री कर लिया। बस। अब मुझे नही मालूम कि यह सार्थक है या निरर्थक। आपको मालूम हो तो बातयेगा जरूर।

फ़िलहाल.....

अभी यही बंदिश सुन रह हूँ
गुलाम अली कि आवाज में


तुम बिन लागे सूनी सेजरैया
तुम बिन कटे रैन गुजरिया
मैंने क्या क्या सितम सहे
लाखों के बोल सहे
सितमगर तेरे लिए