कैसे साबित हो कि क्या सार्थक है और क्या निरर्थक। कौन करे यह तय। और करने का आधार क्या हो जिसे सब माने। या कम से कम अधिकांश उसे खा पी चबा सके। एक कि लिए जो सार्थक है वही किसी और के लिए निरर्थक हो सकता है। होने कि पूरी गुन्जायिश है। सिर्फ इसलिए क्यूंकि उसमे सार्थकता जो जुडा हुआ है। अछ एक बड़ा सवाल समय का भी है। किसी खास समय जो सार्थक हो सकता है वही समय बीतने पर निरर्थक। अब ऐसे में आदमी करे तो क्या। बड़ा विकट है। फिर तो जो मर्जी आये वही करना सही है। इस बार नए साल पर मैंने किसी को शुभकामना देने का काम नही किया। खुद आगे बढ़ कर। मजदूरी भरा कम लगता है। यदि कहीं से आया तो जबाब भर देकर इतिश्री कर लिया। बस। अब मुझे नही मालूम कि यह सार्थक है या निरर्थक। आपको मालूम हो तो बातयेगा जरूर।
फ़िलहाल.....
अभी यही बंदिश सुन रह हूँ
गुलाम अली कि आवाज में
तुम बिन लागे सूनी सेजरैया
तुम बिन कटे रैन गुजरिया
मैंने क्या क्या सितम सहे
लाखों के बोल सहे
सितमगर तेरे लिए
Friday, January 4, 2008
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