Wednesday, January 9, 2008
कुछ कहना है
लोकतंत्र जरुरी है तो लोकतांत्रिक होना भी उतना ही जरूरी है। जो में नही हूँ। या उस हद तक नही हूँ जितने की जरूरत है। अभी तीन दिन हुए हैं जब में उस टीम का हिस्सा बना जिसे पत्रिका में पुरस्कृत किया गया। कप्तान थे अरुण चौहान। दरअसल यह खालिश उनकी जीत थी। लेकिन जब लेने की बरी आई तो उन्होने सब को हिस्सा बनाया जो टीम में शामिल थे। जबकि देने के वकत वो अकेले थे। और ये सब सिर्फ अख़बार की बेहतरी के लिए। ताकि लोग काम में शामिल हो सकें। है ना सर...... बिलकुल है। ये में कह रहा हूँ। लेकिन कैप्टन इतना ध्यान रखना, यह karj है जो मैं kabhi ना कभी जरूर उतारुंगा। kab पता नही। फ़िलहाल आपके इतना लोकतंत्र यदि मेरे भीतर आ जाये त कितना मजा आये। लाला सलाम captain। आपके sath काम करना मेरी जिन्दगी का हासिल रहेगा।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

1 comment:
कैप्टेन की तो बात ही निराली है. उस कैप्टेन की टीम का सदस्य होने का अवसर मुझे भी मिला है. तुम्हारी बातें पढ़कर पुराने दिनों मैं लौट गया. कैप्टेन की बहुत याद आई.
csr
https://www.teesari-ankh.blogspot.com
Post a Comment