Thursday, January 10, 2008

बकरचोदी बरास्ते पत्रकारिता

कई बार मुझे लगता है कि बकरचोदी की इंतहा हो गयी। बोलने वाले तो बोलने वाले लिख कर बाल बच्चे का पेट भरने वाले भी गार फार कर भूसा भरने को तैयार हैं। मजे कि बात तो यह है कि जब अपनी गार फटती है तब भी कहते पाए जाते हैं कि क्या मजे कि बात है। भारी बकलंड हैं ऐसे लोग। लेकिन हैं तो हैं। अब मैं ही क्या कम हूँ। नमूना पेश किये जा रह हूँ। एक के बाद एक। अजी अब जिसका भी नाम लूँगा उसी कि गार में आग लग जायेगी। तो मैं ही क्यों अच्छा बनू।

2 comments:

Ashish Maharishi said...

हा हा हा हा

रमेंद्र said...

ब्लाग इसलिए नहीं होता कि कुछ भी लिखें. आप के ब्लाग को आपको भले न लगे दूसरे पढ़ते हैं, उन्हें खराब भी लग सकता है. थोड़ा संभलकर लिखें.