Tuesday, December 4, 2007

अचंभित हूँ

कितना लिख रहे हैं लोग। अपन तो सोचते ही रह जाते हैं। आखिर सोचना कभी तो बंद होगा। फिर देखना। लिख मरूँगा। एक बड़ी मुसीबत लेखन रफ्तार का कम होना भी है। खैर समय के साथ अंगुलियाँ कुछ तो शर्म करेंगी। भाई अभी तो रामराम।

1 comment:

prasoon mishra said...

ye kya likhte rahte ho. kabhi kam ka to likha karo.
sanjay kaushik